Himachalnow / सिरमौर
उत्सव की शुरुआत
सिरमौर जिला के गिरीपार क्षेत्र में मशाल लोक यात्रा और बुड़ेछू लोक नृत्य के साथ सप्ताह भर चलने वाली बूढ़ी दिवाली उत्सव की शुरुआत हो चुकी है। यह पर्व दीपावली के एक महीने बाद, मार्गशीर्ष महीने की अमावस्या पर मनाया जाता है।
बूढ़ी दिवाली का महत्व
बूढ़ी दिवाली पर्व का एक धार्मिक महत्व है। एक मान्यता के अनुसार, वामनावतार ने धरती पर दान करने के बाद पाताल में समाए दानवीर राजा बलि इस अमावस्या को साल में एक बार धरती पर आते हैं और इस खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार, इस क्षेत्र में भगवान राम के अयोध्या लौटने की खबर एक माह बाद पहुंची थी, जिसके कारण यह पर्व मनाया जाता है।
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स्थानीय सांस्कृतिक परंपराएं
सिरमौर जिले में सदियों से दिवाली, मशराली और बूढ़ी दिवाली के दौरान बुड़ेछू या बुड़ियाचू लोक नृत्य का आयोजन होता है। इसके अलावा, विभिन्न गांवों में बूढ़ी दिवाली की सांस्कृतिक संध्याओं का भी आयोजन होता है। इस दौरान मेहमानों को पारंपरिक सिरमौरी व्यंजन जैसे मूड़ा, शाकुली, सीड़ो, धोरोटी, पटवांडे और तेलपाकी आदि परोसे जाते हैं।
जगहों पर पर्व का आयोजन
यह पर्व मुख्य रूप से उपमंडल शिलाई, कफोटा और संगड़ाह में मनाया जाता है। इन क्षेत्रों के गांवों में विशेष रूप से बूढ़ी दिवाली का पर्व मनाया जाता है, जहां दीपावली के दिन कार्यक्रम आयोजित नहीं होते। उपमंडल संगड़ाह के अधिकांश गांवों में इस दौरान मशराली के नाम से सांस्कृतिक संध्याओं या राम लीलाओं का आयोजन किया जाता है।
त्योहार की अवधि
बूढ़ी दिवाली का यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है। इसमें अंवास, पैड़ोई दूज, तीज और जांदोई जैसे नामों से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखते हैं।
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