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नाहन नगीना तो है, मगर इसे तराशने वाले जोहरी न सरकार में मिले, न प्रशासन में

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नाहन के पास संसाधन, इतिहास और पहचान है, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी से शहर अव्यवस्थाओं में घिरा है। मीट दुकानों, पार्किंग और ट्रैफिक जैसी समस्याएं रियासतकालीन शहर की असली तस्वीर दिखा रही हैं।


नाहन

तीनों स्तरों पर इच्छाशक्ति का अभाव
कहावतों में ‘नगीना’ कहलाने वाला रियासतकालीन शहर नाहन आज ज़मीनी हकीकत में अव्यवस्थाओं की मार झेल रहा है। शहर के पास संसाधन हैं, इतिहास है और पहचान भी, लेकिन सरकार, जिला प्रशासन और नगर प्रशासन—तीनों स्तरों पर इच्छाशक्ति के अभाव में यह नगीना तराशा नहीं जा सका।

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प्रशासन और सरकार पर उठे सवाल
नगर परिषद नाहन की पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय रेखा तोमर के पुत्र एवं स्वयं मनोनीत पार्षद रह चुके विशाल तोमर ने शहर की बिगड़ती व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन और सरकार पर सीधा सवाल खड़ा किया है। रोड सेफ्टी क्लब के पूर्व अध्यक्ष विशाल तोमर ने कहा कि नाहन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां समस्याएं गिनाने वालों की कमी नहीं, लेकिन समाधान पर अमल करने वाला कोई नहीं।

मीट दुकानों से बिगड़ती शहर की सूरत
उन्होंने कहा कि शहर में जगह-जगह मीट की दुकानें खुली हुई हैं, जिन्हें शहर से बाहर किसी निर्धारित क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाना चाहिए था। आवासीय और व्यावसायिक इलाकों में संचालित इन दुकानों के चलते नाहन एक शहर कम और बूचड़खाना ज्यादा नजर आने लगा है। यह न केवल शहर की सुंदरता पर दाग है, बल्कि स्वच्छता और स्वास्थ्य मानकों पर भी बड़ा सवाल है।

स्लॉटर हाउस नीति पर सवाल
विशाल तोमर ने कहा कि नाहन जैसे ऐतिहासिक शहर में स्लॉटर हाउस और मीट दुकानों को लेकर कोई स्पष्ट नीति नजर नहीं आती। कहने को स्लॉटर हाउस बनाया गया है, लेकिन वहां कितने पशुओं का कटान होता है और नियमों का कितना पालन हो रहा है, इस पर भी प्रशासन की चुप्पी गंभीर चिंता का विषय है।

पार्किंग, ट्रैफिक और अतिक्रमण की मार
उन्होंने कहा कि पार्किंग, ट्रैफिक और अवैध अतिक्रमण की समस्या ने शहर को पूरी तरह जकड़ लिया है। सड़कों के किनारे खड़ी गाड़ियां नाहन की सुंदरता पर बदनुमा दाग बन चुकी हैं। शहर के बीच स्थित नाहन फाउंड्री की भूमि वर्षों से अनुपयोगी पड़ी है, जिसे पार्किंग और प्रशासनिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल कर शहर को राहत दी जा सकती है, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया।

धरोहरें उपेक्षा की शिकार
पूर्व मनोनीत पार्षद ने कहा कि रियासतकालीन धरोहरों पर प्रशासनिक कब्जा है, जिन्हें पर्यटन के लिए विकसित किया जा सकता था। इसके उलट शहर में अव्यवस्था, प्रदूषण और अराजकता बढ़ती जा रही है। देर रात तक आवासीय क्षेत्रों में शोर, अव्यवस्थित दुकानें और भारी वाहनों की आवाजाही आम हो चुकी है, लेकिन कार्रवाई नदारद है।

साहसिक फैसलों की जरूरत
उन्होंने कहा कि नाहन को केवल भाषणों और कहावतों में ‘नगीना’ कहने से काम नहीं चलेगा। यदि सरकार और प्रशासन को वास्तव में शहर की चिंता है, तो अब कड़े और साहसिक फैसले लेने होंगे, ताकि नाहन अपनी पहचान और गरिमा दोनों बचा सके।

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