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NCB के दावों पर प्रश्नचिह्न: कानूनी ‘कंट्रोल सैंपल्स’ को अवैध बताकर फार्मा कंपनी Digital Vision को फँसाने की कोशिश का खुलासा

Shailesh Saini | 3 नवंबर 2025 at 2:14 pm

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हिमाचल फार्मा विवाद: Digital Vision का दावा- NCB ने ‘गलत इरादे’ से वैध फर्मों की सप्लाई को किया ‘मैनिपुलेट’

नाहन/शिमला।

हिमाचल प्रदेश में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की एक हालिया कार्रवाई गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। मीडिया द्वारा जुटाए गए ठोस तथ्य और सबूतों के आधार पर एक चौंकाने वाला बड़ा खुलासा हुआ है कि NCB ने फार्मा कंपनी M/s Digital Vision के खिलाफ कार्रवाई में न केवल परस्पर विरोधी कदम उठाए, बल्कि वैध कानूनी दस्तावेजों और तथ्यों को भी पूरी तरह से अनदेखा किया। कंपनी ने NCB पर “पक्षपातपूर्ण मानसिकता” और “गलत इरादे” से पूरे मामले को ‘मैनिपुलेट’ करने का सीधा और गंभीर आरोप लगाया है।

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​NCB के पंचनामे का ही विरोधाभास: कंट्रोल सैंपल्स बने रिकवरी

​NCB ने अपनी कार्रवाई के दौरान कंपनी के परिसर से 1368 कैप्सूल और 16 बोतलें जब्त करने का दावा किया था, जिसे अवैध रिकवरी के रूप में दर्शाया गया। M/s Digital Vision ने इस दावे को सीधे चुनौती दी है।

खुलासा यह है: कंपनी के पास मौजूद दस्तावेजी सबूतों के अनुसार, ये सभी जब्तशुदा दवाएं ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 के नियम 74L के तहत अनिवार्य रूप से रखे जाने वाले कानूनी कंट्रोल सैंपल्स थे, जिनका उपयोग गुणवत्ता जांच के लिए किया जाता है। हैरानी की बात यह है कि NCB ने स्वयं अपने पंचनामे (Panchnama) में लिखित रूप से यह स्वीकार किया था कि सैंपल्स “एक्ट के अनुसार” रखे गए थे। बावजूद इसके, एजेंसी अब अपने ही आधिकारिक रिकॉर्ड का खंडन करते हुए, इन्हीं कानूनी सैंपल्स को अवैध माल बताकर मामले को उलझाने का प्रयास कर रही है।

​’गैर-मौजूद’ फर्मों को सप्लाई: आरोपों की हवा निकली

​NCB का दूसरा मुख्य आरोप था कि M/s Digital Vision ने तीन फर्मों—M/s तिवारी मेडिकल एजेंसी (देहरादून), M/s माँ जगदंबा मेडिकोस (जोधपुर) और M/s रामा मेडिकोस (जोधपुर)—को “गैर-मौजूद” बताकर मनोदैहिक दवाएं सप्लाई की, जिससे दवा का डायवर्जन हुआ।

Digital Vision का प्रमाण: कंपनी ने इस आरोप का खंडन करते हुए वैध प्रमाण पेश किए हैं:

  • वैधता प्रमाण: कंपनी ने स्पष्ट किया कि सप्लाई के समय इन तीनों फर्मों के पास वैध ड्रग लाइसेंस और GST पंजीकरण मौजूद था।
  • दस्तावेजी पुष्टि: कंपनी के पास देहरादून ड्रग विभाग का आधिकारिक पत्र मौजूद है, जो M/s तिवारी मेडिकल एजेंसी के लाइसेंस की वैधता की पुष्टि करता है। कंपनी ने बताया कि तिवारी मेडिकल एजेंसी का लाइसेंस रद्द होने की तारीख से पहले सारी सप्लाई वैध तरीके से की गई थी।
  • कानूनी अनुपालन: कंपनी ने जोर दिया कि उन्होंने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट और हिमाचल प्रदेश ड्रग्स कंट्रोलर के एसओपी (SOP) के तहत सभी अनिवार्य रिकॉर्ड—परचेज ऑर्डर, बिल, ई-वे बिल, बैंक पेमेंट प्रूफ—NCB को सौंप दिए थे। कंपनी ने NDPS एक्ट में “डायवर्जन” जैसे शब्द के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया, इसे NCB की मनगढ़ंत व्याख्या करार दिया है।

​जब्त नकदी पर भी झूठा दावा

​याचिकाकर्ता के घर से जब्त की गई ₹32.45 लाख की नकदी को ड्रग्स से अर्जित आय बताए जाने के आरोप को भी कंपनी ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। कंपनी ने चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा सत्यापित कैश बुक और ऑडिटेड बैलेंस शीट पेश की है, जिसमें यह राशि फर्म के “कैश इन हैंड” के रूप में विधिवत दर्ज है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि उनके घर से NCB को कोई अन्य आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली थी।

M/s Digital Vision ने दावा किया है कि वे सभी कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करते हैं, जिसमें NDPS एक्ट के तहत त्रैमासिक रिपोर्ट NCB मुख्यालय को भेजना भी शामिल है। कंपनी का कहना है कि स्टॉक और दस्तावेजों के फिजिकल वेरिफिकेशन में कोई अनियमितता नहीं पाई गई। इन तथ्यों के आधार पर, कंपनी ने आरोप लगाया है कि NCB ने गलत इरादों से कार्रवाई की है और अब इस मामले में न्याय पाने के लिए न्यायालय से अग्रिम जमानत की गुहार लगाई है।

बरहाल हिमाचल प्रदेश की फार्मा हब को जिस तरह से लगातार बदनाम करने की साजिश रची जा रही है कहीं ना कहीं अब यह बड़े स्तर की जांच का विषय बन गया है। बड़ी बात तो यहां यह भी है कि एनसीबी ने प्रदेश की ड्रग अथॉरिटी को जांच में कार्यवाही के दौरान शामिल क्यों नहीं किया।

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