वन विभाग को मिली बड़ी जिम्मेवारी, रिचार्ज होंगे वाटर सोर्स
HNN / नाहन
केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित एकीकृत विकास परियोजना के तहत प्रदेश वन विभाग को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। स्रोत स्थिरता एवं जलवायु तन्यक वर्षा आधारित एकीकृत विकास परियोजना के तहत प्रदेश की 228 पंचायतों को इसमें शामिल किया गया है। जिसमें जिला सिरमौर की 46 पंचायतें शामिल है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण और उनकी रिचार्ज क्षमता को बढ़ाना है। इसके तहत वन क्षेत्र के साथ लगती पंचायत के आसपास पानी के प्राकृतिक स्रोत जल क्षमता को बढ़ाया जाता है।
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विभाग इसके लिए जलागम क्षेत्र के आसपास प्लांटेशन करता है पानी को रोकने के लिए चेक डैम लगाता है, इसके साथ-साथ वाटर हार्वेस्टिंग के स्ट्रक्चर भी तैयार किए जाते हैं। तकनीकी रूप से मृदा संरक्षण करने के बाद बर्बाद होने वाले पानी को बचाया जाता है। इस योजना के तहत पानी को बचाकर प्राकृतिक स्रोत के साथ अटैच कर दिया जाता है। ऐसा करने से प्राकृतिक स्रोत के पानी की क्षमता बढ़ जाती है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है परियोजना विकास का मुख्य उद्देश्य हिमाचल प्रदेश की चयनित ग्राम पंचायतों में जलधारा के जलागम क्षेत्र में सुधार लाने तथा कृषि क्षेत्र में जल उत्पादकता में तथा आर्थिक मामलों में विविधता लेकर मूल्य संवर्धन तथा प्रभावी कृषि व्यापार सहायता में बढ़ोतरी लाना है। इस योजना से ना केवल जंगली पेड़ पौधों को नमी मिलेगी बल्कि प्राकृतिक स्रोतों के पानी से किसानों की जमीनें भी सिंचित होंगी। प्रधानमंत्री कृषि योजना के तहत इस योजना का मुख्य उद्देश्य मोर क्रॉप पर ड्रॉप है। जानी पानी की एक-एक बूंद को कीमती समझकर उसका सही उपयोग लाना है।

जिला सिरमौर में वन विभाग के तहत आईडीपी परियोजना अधिकारी इसकी तमाम रूपरेखा भी तैयार कर चुके हैं। विभाग के द्वारा चयनित पंचायतों के आसपास वन क्षेत्रों में लिए स्ट्रक्चर बनाए जाने का कार्य शुरू हो चुका है। बता दें कि जिला सिरमौर में पांवटा साहिब की 21, नाहन की 5, संगड़ाह की 12 , राजगढ़ की 6 तथा पच्छाद की दो पंचायतों को शामिल किया गया है। हिमाचल प्रदेश में कुल 428 पंचायतों को इस योजना के तहत रखा गया है।
खबर की पुष्टि करते हुए जिला परियोजना अधिकारी आईडीपी डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा ने बताया इस योजना के तहत जिला की 46 पंचायतों को शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना के चार घटक हैं जिसमें सतत एवं जल संसाधन प्रबंधन, कृषि उत्पादकता में सुधार तथा मूल्य संवर्धन करना तथा एकीकृत जलागम विकास के लिए संस्थागत क्षमता निर्माण व परियोजना प्रबंधन शामिल है।
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