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भाजपा का इन जिलों में हुआ सूपड़ा साफ तो यहां पर खाई मुंह की

SAPNA THAKUR | 9 दिसंबर 2022 at 8:26 am

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HNN/ नाहन

प्रदेश में भाजपा
भाजपा शिमला जिला से 1 सीट पर ही सिमट कर रह गई है, सोलन जिला में भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ है। कांगड़ा जिला में भाजपा केवल 4 सीटें ही ले पाई है। ऊना जिला में भी भाजपा की हालत पतली रही यहां केवल 1 सीट ही निकल पाई। अब यह हमीरपुर जिला है जो केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का गृह क्षेत्र है मगर यहां भी भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ।

सिरमौर ने भाजपा की थोड़ी जान बचाई यहां केवल 2 सीटें ही भाजपा को मिली है। चंबा जिला की बात की जाए तो यहां भाजपा को 3 सीटें मिली हैं। बिलासपुर जिला में भी 3, कुल्लू में 2 सीटें भाजपा को मिली हैं। मंडी जिला से भाजपा 9 सीटें लेने में कामयाब हुई है। लाहौल स्पीति और किन्नौर जिला की बात की जाए तो यहां भाजपा का पूरी तरह सूपड़ा साफ हुआ है।

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प्रदेश में कांग्रेस
सबसे पहले हम सिरमौर जिला की बात करें तो यहां कांग्रेस 3 सीट निकालने में कामयाब हुई है। हमीरपुर से 4 तो एक सीट यहां भी आजाद उम्मीदवार निकाल ले गया है। ऊना जिला में 4 सीटें। सोलन जिला में चार जबकि एक सीट आजाद उम्मीदवार को यहां मिली है। राजधानी शिमला जिला की बात की जाए तो यहां कांग्रेस ने 8 में से 7 सीटें निकालकर रुतबा कायम किया है। इसी प्रकार डिसाइडिंग जिला कांगड़ा से कांग्रेस 10 सीट लेने में कामयाब हुई है।

इसी प्रकार किन्नौर की मात्र 1 सीट लाहौल स्पीति की एक सीट कांग्रेस के खाते में गई हैं। कुल्लू जिला की 4 सीटों में दो कांग्रेस के खाते में। इसी प्रकार मंडी जो कि मुख्यमंत्री रहे जयराम ठाकुर का गृह क्षेत्र है यहां से कांग्रेस 10 में से केवल 1 सीट ले पाने में कामयाब हुई है। बिलासपुर जिला की 4 सीटों में से कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक गई है। चंबा जिला की बात की जाए तो यहां 5 सीटों में से 2 सीटें ही कांग्रेस को मिल पाई है। इस प्रकार कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में 40 सीटें लेने का रिकॉर्ड बनाया है।

भाजपा की हार की वजह
प्रदेश में भाजपा की करारी हार का सबसे बड़ा मुद्दा ओ पी एस रहा। मगर केवल बिलासपुर जिला ही ऐसा था जहां ओ पी एस का जादू नहीं चला। दूसरी मुख्य वजह सरकार और संगठन दोनों का नेतृत्व सबसे कमजोर था। दोनों की निर्णय क्षमता लगभग 0 कही जा सकती है। चुनाव के दौरान अपने किए पर कम केंद्रीय निर्णयों पर ही भाजपा ने फोकस किया हुआ था। बार-बार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का हवाला देकर रिवाज बदलने की बात की जा रही थी।

जबकि प्रदेश में जयराम सरकार के द्वारा किए गए अभूतपूर्व कार्य खुद में जीत के लिए पर्याप्त थे जिन्हें ना तो भाषणों में ठीक से उतारा गया और ना ही रिवाज बदलने के लिए इनका कूटनीतिक प्रयोग किया गया। चुनाव प्रचार तथा आचार संहिता लगने से पहले भाजपा के द्वारा सरकारी खर्चे पर किए गए प्रचार-प्रसार के साथ जो एचआरटीसी की तमाम बसें थी वह जनता को नहीं मिल पाई। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग, महिलाएं, बच्चे सड़कों पर धक्के खाते हुए पैदल या टैक्सी कर घर पहुंचे।

जनता को चिढ़ाने में यह भी एक बड़ा फैक्टर रहा। वही भाजपा के केंद्र से आने वाले ब्रांड चेहरे बार-बार प्रदेश में प्रचार प्रसार के लिए आए। ऐसे में जो समय प्रत्याशियों को जनता के बीच में लगाना चाहिए था उसकी जगह ब्रांड नेता के लिए भीड़ जुटाने की रणनीति बनाने में प्रत्याशी के चार चार दिन व्यर्थ गए। मगर उन ब्रांड दिग्गज चेहरों का कोई जादू नहीं चल पाया। प्रदेश में भाजपा पूरी तरह मोदी के नाम पर ही पालना झूल रही थी खुद गहरी नींद में सो रही थी।

प्रदेश में भाजपा की रणनीति को सही मायने में दशा और दिशा जो नेता दे सकता था उसको भाजपा ने हाशिए पर रखा। उस पर भ्रष्टाचार के आरोप स्वयं सिद्ध करवाए गए। जबकि अन्य कांडों में भाजपा ने अपने नेताओं को हर तरह से बचाया और क्लीन चिट दी। जिनमें शराब कांड, खनन कांड, पुलिस भर्ती मामले आदि रहे। केंद्र से आने वाले ब्रांड चेहरे प्रदेश की वस्तु स्थिति के अलावा विधानसभा वॉइज किस मुद्दे पर बोलना है उस पर पूरी तरह फेल रहे।

जैसे नाहन में स्मृति ईरानी आई मगर जो जातीय समीकरण बिंदल के लिए हार का कारण बनी उस पर जहां उन्होंने मरहम लगाना चाहिए था वही और अधिक आग सुलगा कर चली गई। अमित शाह आए मगर साथ में दुनिया की सबसे बड़ी ताकतवर पार्टी कहलाने के साथ हाटी का गारंटी पत्र साथ नहीं लाए। पीएम नरेंद्र मोदी बार-बार हिमाचल आए यहां उन्होंने केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर ही अपने भाषण केंद्रित रखें। वही भाजपा का मीडिया प्रबंधन सबसे कमजोर साबित रहा।

डिजिटल मीडिया की पावर को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए केवल देरी से छपने वाले समाचारों और बड़े-बड़े राष्ट्रीय चैनलों को जमकर विज्ञापन बांटे। टीवी से एंड्रॉयड पर उतरे मीडिया को मीडिया प्रबंधन समझ नहीं पाया। भाजपा के लिए अच्छा होता कि प्रदेश के ही चेहरों को ब्रांड चेहरे बनाया जाता और अधिकतर समय प्रत्याशी अपने विधानसभा क्षेत्र के प्रचार प्रसार में जनता के बीच लगाता तो आज यह स्थिति ना होती।

बावजूद इन सब मुद्दों के प्रदेश में केवल ओ पी एस सबसे बड़ा हार का कारण बना। यहां पर कर्मचारी नेता अश्विनी ठाकुर पूरी तरह से फेल साबित हुए। ओ पी एस को लेकर कर्मचारी नेता अगर कूटनीतिक प्रयोग से इस मुद्दे को नियंत्रित कर लेते तो निश्चित ही प्रदेश में भाजपा रिवाज बदलने में कामयाब हो जाती। अब संगठन के तौर पर बात की जाए तो नेता ऐश करते रहे जबकि कार्यकर्ता अत्यधिक पार्टी एक्सरसाइज में ओवर बर्डन में आ गया।

अधिकतर पन्ना प्रमुख आदि जैसे कार्यकर्ताओं ने वास्तविक रिपोर्ट ना देकर केवल टेबल रिपोर्ट बनाई। पूर्व में बाय इलेक्शन में भी यही स्थिति थी जिसको संगठन समझ नहीं पाया। कार्यकर्ताओं को जो मान सम्मान मिलना चाहिए था वह ओवरबर्डन के बावजूद नहीं मिल पाया। कमोवेश एन वक्त पर भाजपा की गुटबाजी ने कांग्रेस को भी पछाड़ दिया। अचानक कांग्रेस में सेंधमारी कर उनके नेताओं को तोड़ने की रणनीति भाजपा के कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरी।

भाजपा के इस प्राचीन प्रयोग का समझदार जनता के बीच कोई फायदा नहीं हुआ। ऐसी जगह पर भाजपा ही भाजपा के प्रत्याशी की हार का सबसे बड़ा कारण बनी। प्रदेश में जयराम ठाकुर स्वच्छ व साधारण छवि के एक ब्रांड चेहरा थे मगर उन पर केंद्रीय नियंत्रण ने उनकी निर्णय क्षमताओं को अत्यधिक दबाव में लाकर रख दिया। जबकि सियासी शिक्षा यह कहती है कि चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री को पूरी तरह फ्री हैंड कर देना चाहिए।

ऐसे बहुत से कारण थे जो भाजपा की हार के कारण बने। निश्चित ही यह तो तय है कि रिवाज बदलने से पहले प्रदेश के कर्मचारी वर्ग को नियंत्रण करने के लिए ट्रांसफर नियंत्रण पॉलिसी बनाना भी जरूरी होगा अन्यथा ऐसे ही मुद्दे किसी भी सरकार के लिए गले की फांस बनते रहेंगे।
अपने-अपने जिला में बैठने वाले सालों से एक ही सीट पर काबिज रहने वाले कर्मचारी अमूमन नौकरी कम राजनीति ज्यादा करते हैं।

बरहाल, भाजपा को अपनी हार की समीक्षा में गहन मंथन करते हुए शांत स्वभाव के साथ सही वक्त का इंतजार करना चाहिए। जोड़-तोड़ के कूटनीतिक प्रयोगों की जगह विपक्ष की बेहतर भूमिका के साथ फिर से जनता के दिल में जगह बनानी चाहिए। अगर प्रदेश में भी भाजपा ने अन्य राज्यों की तरह जोड़-तोड़ के खेल खेलने की कोशिश करी तो निश्चित ही आने वाले संसदीय चुनावो में ना केवल प्रदेश से बल्कि देश के कई राज्यों से विपरीत परिणाम देखने को मिलेंगे।

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