कालाअंब की बड़ी इंडस्ट्रीज को पहुंचाया लाभ, विभाग ने किया 50 से अधिक पन्नों का आरोप पत्र तैयार
HNN / नाहन
पूर्व सरकार के चहेते रहे राज्य कर एवं आबकारी विभाग दक्षिण प्रवर्तन क्षेत्र परवाणू के संयुक्त आयुक्त के कारनामों का विभाग के उच्च अधिकारियों ने काला चिट्ठा तैयार कर लिया है। 50 पन्नों से अधिक तैयार किए गए आरोपपत्र को विभागीय जांच के बाद प्रधान सचिव को सौंप दिया गया है।
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*क्या है मामला*
मामला कुछ इस प्रकार से है कि राज्य कर एवं आबकारी विभाग के एचओडी को जानकारी मिली कि काला अंब की एसएस लाइफ साइंस सहित दर्जनों फेक फर्मो को कथित अधिकारी की मिलीभगत से करोड़ों का टैक्स क्रेडिट हुआ है। मिली शिकायत को गंभीरता से लेते हुए राज्य कर एवं आबकारी विभाग के कमिश्नर यूनुस खान के द्वारा अपने अधिकारियों की एक टीम बनाकर परवाणू भेजा। चुनावी आचार संहिता लगने से पहले इस टीम के द्वारा दक्षिण प्रवर्तन क्षेत्र परवाणू स्थित कार्यालय में जांच की कार्यवाही को अंजाम दिया।
यह पूरी कार्यवाही बड़े ही गोपनीय तरीके से की गई थी। जिसमें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज टीम के हाथ लगे। यहां यह भी बताना जरूरी है कि जो शिकायत राज्य मुख्यालय में भेजी गई थी वह बाकायदा ऑफिशियल कैपेसिटी पर हुई थी। जानकारी तो यह भी है कि विभाग के द्वारा मामले की गंभीरता को देखते हुए विजिलेंस इंक्वायरी के लिए भी सिफारिश कर दी गई है। वही, जब इस कार्यवाही के बारे में कार्यालय के संयुक्त आयुक्त को पता चला तो वे इस पर बिलबिला गए।
वही चुनावी आचार संहिता के बाद सरकार बनते ही जांच में शामिल रहे एक अधिकारी के खिलाफ जीएसटी चोरी का मामला उठा दिया गया।असल में जीएसटी रिफंडिग एक ऐसा सिस्टम है जिसमें कंपनी बाकायदा टैक्स पर करती है, मगर इसमें जीएसटी रिफंड को लेकर अधिकारी तमाम दस्तावेजों की जांच भी करता है। दस्तावेजों की जांच में कोई भी कमी होने पर टिन नंबर ब्लॉक कर दिया जाता है। मगर यहां यह जरूरी होता है कि जिस फर्म का टिन नंबर ब्लॉक किया गया है उसके कारण भी ऑनलाइन ही चढ़ाने पड़ते हैं।
तो वही अधिकारियों ने जांच में यह भी पाया कि प्रवर्तन अधिकारी के द्वारा ऐसा ना कर सीधे-सीधे टिन नंबर को ब्लॉक कर दिया जाता था। अब बिना टिन नंबर के फर्म के कई कार्य रुक जाते हैं लिहाजा इसी मजबूरी का फायदा भी उठाया जाता है।विभागीय सूत्रों की माने तो एक बड़े लेन-देन के बाद ही टिन नंबर अनब्लॉक किया जाता था। यहां हैरानी की बात तो यह भी है कि कथित आरोपी अधिकारी के खिलाफ बकायदा ऑफिशियल शिकायत दर्ज होने के बावजूद अभी भी उनके पास इंडियन टेक्नोमेक जैसी फैक्ट्री को नीलाम करने की जिम्मेवारी दी गई है।
हालांकि इंडियन टेक्नॉमैक का मामला माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन चल रहा है। लिहाजा इस विषय पर कुछ ज्यादा नहीं कहा जा सकता। मगर यहां हैरानी इस बात की भी है कि जिस फैक्ट्री के घोटाले में टैक्स चोरी की एसेसमेंट 2176 करोड रुपए की गई थी उसे इतने घाटे के सौदे में किस लिए नीलाम किया जा रहा है। जबकि बैंक बिजली आदि की देनदारियों की असेसमेंट की जाए तो इस उद्योग पर 6000 करोड़ की टैक्स चोरी का आरोप है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि डेढ़ सौ करोड़ में क्या बैंक और बिजली बोर्ड चुप बैठा रहेगा।
जाहिर है सबसे पहले बैंक अपनी रिकवरी पूरी करता है।विश्वसनीय सूत्रों से तो यह भी पता चला है कि नीलामी करवाने वाले अधिकारी को पूरा भरोसा है कि इस बार वह इसे नीलाम करवाने में कामयाब भी हो जाएंगे। अगर इस बार भी नीलामी हो जाती है तो सरकार को राजस्व का लाभ भी होगा। बरहाल, उच्च अधिकारियों को कथित मामले में यह भी जानकारी मिल चुकी है कि कुछ बेनामी संपत्ति भी जुटाई जा चुकी है। संभवत इंफोर्समेंट यानी बिजनेस इंक्वायरी में तमाम पहलुओं पर गंभीरता से जांच हो सकती है। देखना यह होगा पूर्व सरकार के चहेते रहे अधिकारी के खिलाफ सरकार किस स्तर पर जांच को आगे लेकर जाती है।
उधर, राज्य कर एवं आबकारी विभाग के कमिश्नर यूनुस खान से जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि अभी मामले में जांच जारी है इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। उन्होंने बताया कि चुनावी आचार संहिता से पहले उन्हें कुछ बड़ी गंभीर शिकायतें मिली थी। मिली शिकायतों के बाद अधिकारियों की टीम बनाकर परवाणू भेजी गई थी जहां कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां मिली। उन्होंने बताया कि मामला सरकार के राजस्व का है लिहाजा पूरी पारदर्शिता के साथ जांच की जा चुकी है। आरोप पत्र तैयार कर सरकार को भेज दिया गया है।
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