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लोन बकाया पर जारी चेक बाउंस मामले में सत्र न्यायालय ने दोषी की अपील खारिज

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एक वर्ष की कैद और तीन लाख रुपये मुआवजे की सजा को सत्र न्यायालय ने बरकरार रखा है। अदालत ने चेक बाउंस को गंभीर कानूनी अपराध मानते हुए दोषी को राहत देने से इनकार किया।

सिरमौर/नाहन

सत्र न्यायालय का सख्त रुख
चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय नाहन ने सख्त रुख अपनाते हुए दोषी की अपील को खारिज कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन की अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक वर्ष की साधारण कारावास तथा तीन लाख रुपये मुआवजे की सजा को पूरी तरह से बरकरार रखा है।

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बैंक ऋण से जुड़ा मामला
यह मामला हिमाचल प्रदेश स्टेट एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक (एआरडीबी) की राजगढ़ शाखा से जुड़ा है, जिसमें हरदेव सिंह पुत्र जीवनू, निवासी गांव गंदूरी, तहसील नौहराधार को चेक बाउंस का दोषी ठहराया गया था।

ऋण और बकाया राशि का विवरण
अदालत में प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार हरदेव सिंह ने वर्ष 2018 में ग्रामीण गोदाम निर्माण के लिए बैंक से 2 लाख 50 हजार रुपये का ऋण लिया था। ऋण की किस्तें समय पर जमा न होने के कारण जुलाई 2021 तक उस पर 1 लाख 61 हजार 309 रुपये की देनदारी बन गई।

चेक बाउंस और कानूनी प्रक्रिया
बकाया राशि चुकाने के लिए आरोपी ने अगस्त 2021 में बैंक को एक चेक जारी किया। बैंक द्वारा चेक को भुगतान के लिए प्रस्तुत करने पर खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद नियमानुसार कानूनी नोटिस जारी किया गया, लेकिन तय अवधि में भुगतान नहीं किया गया।

निचली अदालत का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट राजगढ़ ने 4 दिसंबर 2024 को आरोपी को दोषी करार देते हुए एक वर्ष की साधारण कारावास तथा तीन लाख रुपये मुआवजा अदा करने की सजा सुनाई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी।

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट का हवाला
अपील पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन ने स्पष्ट किया कि यह मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का है, न कि केवल लोन विवाद का। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार का हवाला देते हुए कहा कि हस्ताक्षरित चेक जारी करने वाला व्यक्ति उसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता, भले ही चेक में विवरण बाद में भरा गया हो।

सुरक्षा चेक का तर्क अस्वीकार
अदालत ने आरोपी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि चेक बैंक को केवल सुरक्षा के तौर पर दिया गया था। न्यायालय ने इसे बाद में गढ़ा गया बचाव मानते हुए अस्वीकार कर दिया।

अपील खारिज, सजा बरकरार
अंत में अदालत ने निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और आदेश दिया कि दोषी को एक वर्ष की कैद भुगतनी होगी तथा बैंक को तीन लाख रुपये मुआवजा देना होगा। मुआवजा अदा न करने की स्थिति में दोषी को दो माह की अतिरिक्त कैद भुगतनी पड़ेगी।

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