सवाल: मानवीय सेवा के लिए जूझ रही डॉ. मनीषा को कब मिलेगी सरकारी और सामाजिक मदद?
हिमाचल नाऊ न्यूज़ सिरमौर:
हिमाचल प्रदेश के धगेड़ा ब्लॉक में अपनी ड्यूटी निभा रहीं ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) डॉ. मनीषा का जीवन त्याग और करुणा का वह दुर्लभ अध्याय है, जिसकी तरफ समाज का ध्यान जाना नितांत आवश्यक है।
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उन्हें यूं ही बेसहारा स्ट्रीट डॉग्स की ‘मदर टेरेसा’ नहीं कहा जाता—यह उपाधि उनके उस बेमिसाल समर्पण की गवाह है, जहाँ उन्होंने अपनी नौकरी के साथ-साथ अपना पूरा जीवन इन बेजुबान, लाचार प्राणियों के लिए समर्पित कर दिया है।
डॉ. मनीषा की संवेदनशीलता का आलम यह है कि वह अपने मासिक वेतन का आधे से भी ज़्यादा हिस्सा लाचार, बीमार और बेसहारा कुत्तों के उपचार और भोजन पर खर्च कर देती हैं। कई बार तो उन्हें इन निरीह जीवों के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है, क्योंकि उन्हें खुद खाना मिले या न मिले, इनका पेट खाली नहीं रहना चाहिए।
घर दिया, पर मिला विरोध
करुणा की पराकाष्ठा तो तब दिखी, जब डॉ. मनीषा ने दर्जन भर से अधिक लाचार और बीमार कुत्तों को अपने घर में ही आश्रय दिया। उनका घर इन बेसहारा प्राणियों के लिए आखिरी उम्मीद की किरण था। विडंबना देखिए, इस पवित्र मानवीय कार्य के बदले उन्हें समर्थन नहीं, बल्कि विरोध का सामना करना पड़ा।
पड़ोसियों ने उनके डॉग्स को शेल्टर देने पर आपत्ति जताई और शिकायतें कीं, लेकिन इन शिकायतों से भी उनका दृढ़ निश्चय और समर्पण भाव ज़रा भी नहीं डगमगाया।
मानवता के इस प्रयास पर समाज क्यों मौन?
डॉ. मनीषा हमेशा पब्लिसिटी से दूर रहकर अपना यह नेक काम करती रही हैं, लेकिन उनका यह संघर्ष समाज और सरकार से एक सीधा सवाल पूछता है: जब एक व्यक्ति अपने जीवन और आय का इतना बड़ा बलिदान दे रहा है, तब पशु-प्रेम का दिखावा करने वाली संस्थाएं और सरकारी तंत्र गहरी निंद्रा में क्यों है?
आज तक किसी ने भी डॉ. मनीषा के इस परोपकारी कार्य को देखते हुए इन बेसहारा जीवों के लिए 5 बीघा ज़मीन देना भी मुनासिब नहीं समझा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहाँ उन्हें सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए, वहाँ वे अकेले संघर्ष कर रही हैं।
डॉ. मनीषा का यह कार्य केवल पशु प्रेम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का प्रतीक है। उनके विरोधी भले हों, लेकिन उनके इस पवित्र मिशन के समर्थक कहीं ज़्यादा हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और समाज गहन चुप्पी तोड़कर आगे आएँ।
बरहाल इन लाचार, बेसहारा और निरही प्राणियों के लिए एक सुरक्षित शेल्टर होम बनाने हेतु लोगों, संस्थाओं और सरकार को दिल खोलकर अनुदान देना चाहिए, ताकि एक डॉक्टर की करुणा का यह संकल्प अधूरा न रह जाए।
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