उच्च गुणवत्ता वाला लहसुन उगाने में सिरमौर ने बनाई देश में अपनी नंबर 1 पहचान
HNN/ नाहन
एक और जहां इस बार किसानों के लाल सोना कहलाने वाले टमाटर ने किसानों को मालामाल किया है, तो वहीं इस बार लहसुन भी कुबेर का खजाना साबित हुआ है। जिला सिरमौर ने इस बार 60,000 मीट्रिक टन से भी अधिक लहसुन का उत्पादन किया है जिसकी कीमत करीब लगभग 700 करोड़ से अधिक पार की गई है। बड़ी बात तो यह है कि सिरमौर के लहसुन की सबसे ज्यादा डिमांड चेन्नई व तमिलनाडु में है।
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इस बार हुई लहसुन की बेहतर पैदावार के लिए एग्रीफाउंड पार्वती नाम की किस्म वरदान साबित हुई है, जबकि जम्मू से लाया जाने वाला गैर परिष्कृत बीज कोई खास दमदार साबित नहीं हुआ है। बता दें कि एग्रीफाउंड पार्वती नेशनल हॉर्टिकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन के माध्यम से इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICR) के द्वारा उच्च गुणवत्ता के साथ तैयार किया जाता है। अब यह जानना बहुत जरूरी है कि आईसीआर केवल सीड ही तैयार करती है। इनके द्वारा तैयार किए गए सीड को खाने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
यही वजह है कि भले ही पार्वती बीज महंगा हो मगर इससे पैदा हुई फसल में ना तो कीड़ा लगता है ना ही किसी प्रकार की कोई बीमारी लगती है। इस सीड से उगाए गए लहसुन की सबसे ज्यादा मांग चेन्नई तमिलनाडु आदि बड़े राज्य में है। इसकी दूसरी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि इस किस्म के सीड से उगाए गए लहसुन का साइज भी काफी भरा और गुणवत्ता से भरपूर होता है। वहीं ब्लैक गार्लिक तैयार करने वाले उद्योगपतियों की भी सबसे ज्यादा डिमांड इसी लहसुन की होती है।
बता दें इस समय ब्लैक गार्लिक का रेट भी 750 से लेकर 2000 रुपए प्रति किलो तक हो गया है मगर सिरमौर में अभी तक यहां के लहसुन से कोई भी ब्लैक गार्लिक प्रोसेस नहीं करता है। बता दें कि जिला के 4000 हेक्टेयर एरिया में लहसुन का उत्पादन किया जाता है। करीब 60,000 मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन भी हुआ है। किसानों ने करीब 70 से 80 फीसदी लहसुन बेच दिया है। बाकी का लहसुन अभी सितंबर, अक्टूबर, नवंबर में बेचने के लिए स्टॉक कर चुके हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि इन महीनों में लहसुन का रेट काफी ज्यादा रहता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लहसुन की एक बेहतर परंपरा को बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले बीज पर ही भरोसा करना चाहिए। उनका तो यह भी मानना है कि यदि किसान जम्मू का बीज या अन्य गैर रिसर्च किया हुआ बीच लहसुन की खेती के लिए खरीदते हैं तो उससे न केवल अपनी फसल बल्कि दूसरे की फसल भी खराब होने का डर रहता है। बरहाल अब यदि सिरमौर का युवा चंद पैसों की नौकरी के लिए गांव से पलायन करता है तो उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा।
क्योंकि देश में सिरमौर की ऐसी दो फसलें प्रमुख हो चुकी है जिनकी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में इस मांग को निरंतर बनाए रखने के लिए सिरमौर के किसानों को केवल और केवल सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए बीज की ही पैदावार करनी चाहिये।
उधर, जिला उपनिदेशक कृषि विभाग राजेंद्र ठाकुर ने खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि इस बार 60,000 मीट्रिक टन से अधिक पैदावार हुई है। तो वहीं कृषि प्रसार अधिकारी रणवीर सिंह का कहना है कि एग्रीफाउंड पार्वती बीज वरदान साबित हुई है। उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि आईसीआर द्वारा प्रमाणित बीज को ही इस्तेमाल करें। तो इससे भविष्य में भी एक बेहतर मार्केट वैल्यू किसानों को मिलती रहेगी।
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