श्री रेणुका जी झील से लिया गया था सैंपल, ढाई सौ साल पहले का खंगाला इतिहास
HNN/ नाहन
उत्तर पश्चिम हिमालय तथा हिमाचल प्रदेश में इस बार मानसून से पहले शुरू हुई भारी बारिश और तबाही को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। अब यदि वाडिया हिमालयन इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र मीणा के जेजीएसआर जनरल ऑफ जिओ साइंसेज रिसर्च में शामिल हुए रिसर्च डॉक्यूमेंट पर नजर डालें तो भारी बारिश से हुई तबाही को लेकर ना तो हो रहा विकास और ना ही मनुष्य इसके लिए जिम्मेदार है।
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इस रिसर्च डॉक्यूमेंट में करीब ढाई सौ वर्ष पहले हिमालयन क्षेत्र में आद्रता और शुष्क मौसम के क्या पैरामीटर थे उसको लेकर सेडिमेंट जुटाए गए और आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि इसके लिए हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर से ताल्लुक रखने वाली प्राचीन सतयुग कालीन श्री रेणुका जी झील से सैंपल उठाए गए थे। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर नरेंद्र मीणा 2010 और उसके बाद कई बार यहां से झील की तलहटी से कोर सैंपलिंग करके ले गए थे।
जिसका मुख्य उद्देश्य हिमालयन क्षेत्रों की झीलों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन और उसका संरक्षण आदि इसमें शामिल था। उसी सेडिमेंट की कोर सेंपलिंग के आधार पर वर्ष 1839-1890 में मौसम कितनी आद्रता थी तथा 1890-1929 व 2003 में जलवायु कितनी शुष्क थी इसको वैज्ञानिक तरीके से जांचा गया। असल में इसकी जरूरत इसलिए महसूस हुई की किसी भी तरह के मौसम खासतौर से वर्षा ऋतु के दौरान काफी समय पहले ही एक स्टिक जानकारी योजनाकारों एवं सरकारों को मिल सके।
झील से उठाए गए ढाई सौ साल पुराने सेडिमेंट के आधार पर क्लाइमेट रिकॉर्ड को रिकंस्ट्रक्ट किया गया। वैज्ञानिक के द्वारा इसकी जन्मकुंडली को खंगालने के लिए कई प्रॉक्सी पैरामीटर का उपयोग किया गया। बड़ी बात तो यह है कि झील के अवसादो की उम्र की गणना जो है वह लैड आइसोटोप की मदद से की गई है। अब जो हैरान कर देने वाले आंकड़े निकल कर आए उससे किस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बारिश पड़ी है और पड़ेगी इसकी संभावना इस रिसर्च आर्टिकल में डिस्कस की गई है।
इस रिसर्च डॉक्यूमेंट के अनुसार समुंदर की सतह के तापमान में जो बदलाव आया है जिसे अनलिनो (इएनएसओ ) तथा इंडियन ओसियन डाई पोल (आईओडी ) दोनों के इंटरप्ले के बाद मानसून की दशाएं क्या रहेंगी यह पता चला। यह वह दशाएं होती है जो उत्तर पश्चिम भारत में मानसून की वर्षा के वितरण को नियंत्रित करती हैं। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य प्रकृति के द्वारा पैदा होने वाली परिस्थितियों को बदल तो नहीं सकता मगर उन परिस्थितियों से क्या प्रभाव पड़ेगा किस तरह का मौसम रहेगा और आपदाओं की स्थिति क्या रहेगी इसकी सटीक जानकारी मिल सकती है।
इस रिसर्च डॉक्यूमेंट के आधार पर किसी भी साल या फिर लगातार कुछ सालों तक पॉजिटिव आईओडी और इएनएसओ का मिलन उत्तर पश्चिम हिमालय में भारी बारिश ला सकता है। यह भी खुलासा पहले ही किया जा चुका है। और ठीक रिसर्च डॉक्यूमेंट के अनुसार ही यह मौसम में बड़ा परिवर्तन पुष्ट हुआ है। असल में सरकार अभी अनलिनो या लानिनो के पैटर्न के आधार पर ही मौसम को लेकर तैयारियां करती है।
अब अगर इसमें पॉजिटिव एवम् नेगेटिव आईओडी को भी शामिल किया जाता है तो यह और बेहतर तरीके से मौसम का फोरकास्ट कर सकता है। यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो जो मौसम को जानने के लिए पैटर्न इस्तेमाल किया जाता है उसमें कई वेरिएबल होते हैं। ऐसे में यदि थोड़ा भी फर्क किसी वेरिबल में पड़ जाता है तो मौसम का सही आंकलन बदल जाता है।
क्या होना चाहिए
अब यदि सरकार को ऐसी आपदाओं में पहले ही मौसम की सटीक जानकारी मिल जाती है तो इसकी पहले से ही बड़ी तैयारी की जा सकती है। जिसके लिए अब आने वाले समय में प्रिडिक्शन मॉडल की जरूरत है। पहाड़ी राज्यों में इएनएसओ, आईओडी एवं इस प्रकार के अन्य इंडिकेटर का प्रिडिक्शन मॉडल में इस्तेमाल होना चाहिए जिससे मौसम की भविष्यवाणी और ज्यादा सटीक हो पाएगी।
अगर केंद्र तथा राज्यों की सरकार डॉपलर रडार स्थापित कर देती है तो वर्षा कितनी होगी किस क्षेत्र में होगी और किस दिन होगी कितने सेंटीमीटर तक होगी इसकी काफी हद तक सटीक जानकारी मिल पाएगी। सबसे गौर करने वाली बात यह है की 2021 में प्रकाशित इस शोध में बताई गई संभावना इस बार हिमालयन क्षेत्रों में खासतौर से हिमाचल में ज्यादा बारिश के रूप ने चरित्रार्थ हो गई जिससे काफी तबाही देखने को मिली।
गौरतलब हो कि डॉक्टर नरेंद्र मीणा वही वैज्ञानिक है जिन्होंने श्री रेणुका जी झील में कई दिनों तक अपना वैज्ञानिक बेड़ा स्थापित कर इसका गहन अध्ययन किया था। उन्होंने कोर सैंपल के लिए दुनिया की सबसे आधुनिक और महंगी तकनीक का इस्तेमाल भी किया था। जिसके बाद इस झील की बेथीमेट्री रिसर्च भारत सरकार को भेजी गई थी। उस रिसर्च के अनुसार श्री रेणुका जी झील की कितनी गहराई है मौजूदा समय उस पर किस तरह के संकट हैं और उसका वैज्ञानिक तरीके से किस तरह उपचार हो सकता है इसका उसमें पूरा विवरण भी दिया गया है।
अब होता ऐसा है कि जो सैंपल झील की गहराइयों से लिया जाता है उसको बड़ी ही संजीदगी के साथ लैब रोटरी में संरक्षित रखा जाता है। उसी सैंपल के आधार पर अब मौसम में जो परिवर्तन आए हैं उसको लेकर खोज की गई। निकट भविष्य में हम विश्व में सबसे बेहतर फोरकास्ट कर सकें और फोरकास्ट से पहले होने वाले नुक्सान को बचा सके इसके लिए यह रिसर्च डॉक्यूमेंट मील का पत्थर साबित होगा।
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