कौन विभीषण, कौन भीष्म पितामह… बगैर अंगूठे के एकलव्य की तलाश जारी
HNN/नाहन
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में हाल ही में आई सुनामी के बाद कांग्रेस खुद को रेस्क्यू करने में जुटी हुई है। तो वहीं भाजपा भी मिशन लोटस के मुरझाने के बाद चित्त और पट खेलने के लिए उचित मोहरा तलाश रही है। हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि जहां भाजपा ने शिमला पार्लियामेंट्री सीट पर प्रत्याशी घोषित कर पहले बाजी मारी है, वहीं कांग्रेस की उहापोह समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है।
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असल में नाजुक दौर से गुजर रही कांग्रेस के सामने न केवल पार्लियामेंट्री बल्कि उपचुनाव की विधानसभा सीट भी अब बड़ी चुनौती है। कांग्रेस के सामने सभी 6 सीटे जीतना न केवल प्रतिष्ठा बल्कि खुद को सियासत में कायम रखने का भी एकमात्र रास्ता है। तो वहीं भाजपा ने भी लंगड़े घोड़ों पर दाव खेलकर कोड में खाज पैदा कर ली है।
टिकट आवंटन को लेकर कांग्रेस भले ही कदम फूंक-फूंक कर चल रही हो, मगर उनके लिए जीतने के बाद गुरु दक्षिणा देने वाला एकलव्य कौन साबित हो सकता है इसको लेकर बड़ी टेंशन चल रही है। हालांकि शिमला पार्लियामेंट्री सीट पर जहां महिला प्रत्याशी के तौर पर दयाल प्यारी को देखा जा रहा था, उसमें कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
यहां यह भी बता दें कि दयाल प्यारी भाजपा की कर्मठ सिपाही थी। एक छोटे से प्रकरण के बाद पार्टी को बाय-बाय करने वाली उनकी अदा कांग्रेस के रणनीतिकारों में भी चर्चा का विषय बनी हुई है। वहीं बात यदि फिर से विनोद सुल्तानपुरी की की जाए तो यह परिवार छह बार संसद में रहा है। बावजूद इसके सांसद रहे स्वर्गीय केडी सुल्तानपुरी 17 विधानसभा क्षेत्र में विकास आदि के मामलों में फिसड्डी ही साबित रहे।
फिर चाहे रेल का मुद्दा रहा हो या फिर अफीम की खेती को दवा उद्योगों के लिए बड़ी जरूरत मानते हुए क्षेत्र के लिए परमिट की मांग। नेशनल हाईवे हो या फिर रेणुका बांध का मुद्दा हर मुद्दे पर सुल्तानपुरी कहीं भी चर्चित नहीं रहे। इन सभी मुद्दों पर सबसे बेहतर तरीके से परफॉर्म करने वाले सांसद वीरेंद्र कश्यप दो बार भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब रहे। तो वहीं भाजपा ने भी उनके बेहतर कार्य का सम्मान देते हुए उन्हें राजनीति में पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया।
मौजूदा सांसद और भावी प्रत्याशी सुरेश कश्यप ईमानदार और पार्टी में गुटनिरपेक्ष हैं। बावजूद इसके दोहरे दायित्व में फंसने के बाद वह बहुत से विधानसभा क्षेत्र से नज़राद रहे। बावजूद इसके सांसद निधि का उनके द्वारा बेहतर तरीके से सभी विधानसभा क्षेत्र में आवंटन भी किया गया। अब यदि बात की जाए दूसरे कांग्रेसी चर्चित चेहरे की तो अमित नंदा हर तरह से बेहतर साबित रहते हैं, मगर उन्हें देरी से प्रत्याशी यदि घोषित किया जाता है तो कुछ ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां यह चेहरा परिचय से पूरी तरह अनजान है।
एंटी इनकंबेंसी के चलते सिरमौर के दो विधानसभा क्षेत्र को छोड़कर अमित नंदा शिमला और अपर शिमला बेल्ट में बेहतर स्थिति बन सकते हैं। अब यदि अमित नंदा हर भी जाते हैं तो कांग्रेस के सामने कार्यकर्ताओं को अधिमान दिया जाने का एक बेहतर उदाहरण भी साबित होगा। हालांकि दयाल प्यारी इन सभी समीकरणों में बेहतर साबित होती है, मगर वह अपने विधानसभा क्षेत्र में तब तक कमजोर है जब तक उसके सर पर दिग्गज कांग्रेसी रहे गंगू राम मुसाफिर का हाथ नहीं पड़ जाता।
दयाल प्यारी के नाम पर भाजपा के खेमे में भी टेंशन की लकीरें खिंच जाती हैं। मगर यहां सोचने का विषय यह भी है कि दयाल प्यारी धूमल गुट में आज भी उतनी ही आस्था रखती है जितनी पहले रखती थी। अब यदि दयाल प्यारी नमक और लोटे के साथ अपनी विश्वसनीयता कांग्रेस के प्रति समर्पित करती है तो निश्चित ही कांग्रेस के लिए वह जिताउ साबित होगी।
क्योंकि दयाल प्यारी यह भी जानती है कि यदि विषम परिस्थितियों में भाजपा की ओर से जीतने के बाद अगर उसे ऑफर मिलता है तो वह सीधे केंद्र में मंत्री भी जा सकती है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय दगाबाजी बनी हुई है। बरहाल, अब यदि कांग्रेस और अधिक देरी करती है तो निश्चित ही फिर चाहे प्रत्याशी कोई भी हो इस सीट पर जीत पाना असंभव हो सकता है।
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