भाजपा के बाकी 25 विधायक क्या कर देंगे विधायकी से रिजाइन, यानी प्रदेश में फिर चुनाव
HNN/नाहन
राज्यसभा चुनाव के बाद तेजी से बदले प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों में अब भाजपा अपने मनसूबों में कहीं ना कहीं कामयाब होती नजर आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर 6:00 बजे पीटर हाफ में विधान दल की बैठक के दौरान दिल्ली से लाई रणनीति का खुलासा कर सकते हैं।
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हालांकि यह रणनीति बड़ी गोपनीय होगी, मगर अनुमान लगाया जा सकता है, जिस तरीके से बड़ा तूफान आने से पहले शांत माहौल हो जाता है, कुछ वैसे ही लक्षण नजर आ रहे हैं। राजनीतिक के कूटनीतिक नजरिया से यदि देखा जाए तो संभवत भाजपा के 25 विधायक विधायकी से इस्तीफा दे सकते हैं।
गौरतलब हो कि आज यानी शनिवार को कांग्रेस के बागी विधायक भाजपा ज्वाइन करने जा रहे हैं। यही नहीं बीजेपी के तमाम विधायक शिमला अपने-अपने आवास पर जम गए हैं। बीजेपी ने जिस तरह से अपनी राजनीतिक बिसात बिछाई है उससे यह संकेत स्पष्ट हो रहे हैं कि आज या कल कभी भी भाजपा के सभी 25 विधायक अपने पद से इस्तीफा देकर सरकार को अल्पमत में खड़ा कर सकते हैं।
34-34 के आंकड़े में स्पीकर का मत काउंट नहीं होता। 6 विधायक भाजपा के पहले ही डिसक्वालीफाई किया जा चुके हैं। अल्पमत में आते ही राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। इसके बाद 1 जून को होने वाले उपचुनाव के दौरान पूरे प्रदेश के विधानसभा चुनाव भी डिक्लेयर किया जा सकते हैं।
असल में भाजपा यहां पर डबल गेम नहीं बल्कि ट्रिपल गेम खेल रही है। प्रदेश में सरकार को चित्त और पट के खेल के साथ नए विधायकों के भाजपा में आने से अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी से भी बचाना चाहती है। यानी बगावत का डैमेज कंट्रोल। संभवत इस चुनाव में कुछ नए चेहरों को इंट्रोड्यूस भी करना चाह रही है। क्योंकि मामला न केवल लोकसभा का है बल्कि अब तो विधानसभा का रण भी भाजपा को पहले से ही सजना है।
अब यदि भाजपा कुछ इसी तरह का गेम प्लान कर चुकी है तो उन्हें यह भी मानना होगा कि प्रदेश में कांग्रेस यानी मौजूदा मुख्यमंत्री का सिंपैथी ग्राफ काफी बड़ा है। बरहाल देखते हैं भाजपा अपने तरकश में किस तरह के तीर लेकर राजनीति अखाड़े में कूदती है। मगर यह तो तय है कि दिल्ली गए जयराम ठाकुर और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की लंबी चुप्पी कुछ बड़े ही संकेत दे रही है।
बरहाल अब देखना यह होगा कि कांग्रेस के जो बाकी विधायक हैं वह जनता के द्वारा 5 साल के लिए चुने गए थे ऐसे में कानूनी दावपेच क्या कहते हैं इस पर कांग्रेस को अब पूरा होमवर्क करना पड़ेगा। फिलहाल तो स्थिति यह है कि जिसकी लाठी उसकी ही भैंस है।
मगर अभी तक प्रदेश की राजनीति में ऐसा हुआ नहीं है। तो वही मनमोहन सरकार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों पर कड़े संज्ञान लिए हैं। अब कानूनी पक्ष क्या होगा यह कहा नहीं जा सकता। मगर यह तो तय है कि बीजेपी के दिमाग में कहीं ना कहीं कुछ तो तिकड़म चल रही है
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