प्रदेश के किसानों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों पर आधारित यह नई एडवाइजरी नुकसान कम करके खेती को अधिक लाभकारी बनाने में मदद करेगी। इसमें उन्नत बीज किस्मों, बुआई समय, खाद और रोग नियंत्रण के सटीक निर्देश शामिल हैं।
नाहन
उन्नत बीज, समय पर बुआई और सही खाद का उपयोग
प्रदेश के किसानों को अब की जाने वाली खेती में वैज्ञानिक शोध उनकी फसलों को नुकसान रहित और फायदा पहुंचाने वाला साबित होगा। कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा हिमाचल प्रदेश की मिट्टी और जलवायु के अनुरूप आगामी फसलों के लिए किए गए शोध के बाद एडवाइजरी जारी की गई है। इस एडवाइजरी के सहारे किसान उन्नत बीज की किस्म, बुआई का समय, और बीमारियों के उपचार के साथ साथ जमीन को और अधिक उपजाऊ बनाने की जानकारी सटीक तरीके से ले पाएंगे। कृषि विज्ञान केन्द्र जिला सिरमौर के प्रभारी और प्रधान विज्ञानी डॉ॰ पंकज मित्तल ने बताया कि चौधरी श्रवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के द्वारा दिसंबर दो हजार पच्चीस के पखवाड़े के लिए एक विस्तृत मार्गदर्शिका जारी की गई है। डॉ॰ पंकज मित्तल ने इस बाबत जानकारी देते हुए बताया कि सिंचित अथवा बरानी क्षेत्रों में जहाँ अभी तक गेहूं की बुआई नहीं हुई है वहां सिंचाई करने के उपरांत पछेती बुआई तुरंत शुरू कर देनी चाहिए।
उन्होंने पछेती बुआई के लिए एचपीडब्ल्यू 373, एच एस 490 और वी। एल। आठ सौ बानवे जैसी उन्नत किस्में ही इस्तेमाल करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि निचले पर्वतीय क्षेत्रों में एचडी3086 किस्म कारगर साबित होगी। उन्होंने बताया कि अच्छी उपज सुनिश्चित करने के लिए बुआई के समय प्रतिबीघा 10 किलोग्राम इफको 12:32:16 मिश्रित खाद के साथ चार किलोग्राम यूरिया डालना आवश्यक है। खरपतवार नियंत्रण को लेकर उन्होंने बताया कि जिन खेतों में गेहूं की बुआई को 30 से 35 दिन हो गए हैं और खरपतवारों पर 2-3 पत्तियाँ आ चुकी हैं वहां पर चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 2,4-डी और दोनों प्रकार के खरपतवारों के लिए वेस्टा का इस्तेमाल करना कारगर सिद्ध होगा।
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सब्जियों और आलू की रोपाई के निर्देश
प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सब्जी और आलू की रोपाई और सुरक्षा के भी दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। इस बाबत जानकारी देते हुए डॉ॰ मित्तल ने बताया कि निचले और मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों को प्याज के तैयार पौधों की रोपाई 15 से 20 सेंटीमीटर की पंक्तियों में तथा इफको खाद 12:32:16 का इस्तेमाल करना होगा। किसानों को आलू की बिजाई के लिए कुफरी ज्योति, कुफरी नीलकण्ठ जैसी उन्नत किस्मों के स्वस्थ रोग रहित कंदों को चयनित करने की सलाह दी गई है।
यहाँ बिजाई से पहले कंदों को फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिए एंडोफिल एम-45 के घोल से उपचार करने के बाद ही बुआई करने की नसीहत दी गई है। आलू की खेती में खरपतवारों से बचाव को लेकर ग्रामेक्सॉन या पैराक्वेट का घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। जारी एडवाइजरी में फूलगोभी, बन्दगोभी, मटर, लहसुन आदि सभी प्रकार की सब्जियों में निराई गुड़ाई करने और नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए चार किलोग्राम यूरिया प्रति बीघा डालने के निर्देश भी शामिल हैं।
रोग एवं कीट प्रबंधन: नुकसान रोकने की वैज्ञानिक विधि
वहीं फसलों को हानि से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने बिजाई से पहले गेहूं के बीज को बैस्टिन या रेक्सिल से उपचारित करने पर जोर दिया है। यह उपचार खुली कांगियारी जैसे रोगों से बचाव में कारगर सिद्ध होगा। इस बार वैज्ञानिकों ने दीमक की समस्या वाले खेतों के लिए भी उपचार दिया है। इसके लिए क्लोरोपाइरिफास 20 ईसी को रेत में मिलाकर बिखेरने की सलाह दी गई है। बहरहाल, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी द्वारा जारी एडवाइजरी निश्चित ही किसानों के लिए प्रदेश की जलवायु और मिट्टी अनुरूप कारगर सिद्ध होगी।
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