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सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, अब सुरक्षित रहेंगे वन भूमि पर बसे सेब के बगीचे

Shailesh Saini | 20 दिसंबर 2025 at 12:47 pm

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शिमला/नई दिल्ली:

हिमाचल प्रदेश के लाखों सेब बागवानों के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से एक ऐसी राहत भरी खबर आई है, जिसने पूरे प्रदेश में खुशी की लहर दौड़ दी है। लंबे समय से अपनी आजीविका और पहचान बचाने की जंग लड़ रहे बागवानों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है,

जिसमें वन भूमि पर लगे सेब के बगीचों को हटाने और पेड़ों को काटने का निर्देश दिया गया था। इस फैसले ने उन हजारों परिवारों को उजड़ने से बचा लिया है, जो दशकों से इन बगीचों के भरोसे अपना जीवनयापन कर रहे थे।

आजीविका के अधिकार को मिली सर्वोच्च प्राथमिकता

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यह पूरी कानूनी लड़ाई शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर की याचिका के बाद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से यह पक्ष रखा गया कि छोटे और सीमांत बागवानों के बगीचों को उजाड़ना सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों और रोजी-रोटी का गला घोंटने जैसा है।

अदालत ने इस मानवीय पहलू को स्वीकार किया कि हजारों लोगों को केवल तकनीकी नियमों के आधार पर बेरोजगार नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि हाई कोर्ट का पिछला फैसला जरूरत से ज्यादा सख्त था, जिसमें गरीब किसानों के भविष्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।

बागवानी और पर्यावरण के बीच नए संतुलन की शुरुआत

सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब वन विभाग की उन कार्रवाइयों पर पूरी तरह रोक लग गई है, जिसके तहत फलदार पेड़ों को काटा जा रहा था और बगीचों के चारों ओर तारबंदी की जा रही थी। पिछले कुछ वर्षों में शिमला, कुल्लू और मंडी जैसे सेब बहुल जिलों में इस तरह की कार्रवाई से बागवानों में दहशत का माहौल था।

कोर्ट के इस आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण की रक्षा जरूरी है, लेकिन वह उन लोगों की बलि देकर नहीं होनी चाहिए जिनका अस्तित्व ही इन पहाड़ियों और पेड़ों से जुड़ा है।

छोटे बागवानों के लिए बना सुरक्षा कवच

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ उन छोटे किसानों को मिलेगा, जिनके पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में एक ऐसी उदार और मानवीय नीति तैयार करे, जिसमें छोटे बागवानों को संरक्षण मिले।

कोर्ट का मानना है कि प्रशासन को उन लोगों के बीच फर्क करना चाहिए जो अपनी भूख मिटाने के लिए खेती कर रहे हैं और उन लोगों के बीच जिन्होंने व्यावसायिक लाभ के लिए अवैध कब्जे किए हैं। इस दिशा में अब सरकार को नई नियमावली तैयार करनी होगी।

पूरे प्रदेश में उत्साह और जश्न का माहौल

सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद ऊपरी हिमाचल की वादियों में जश्न का माहौल है। बागवान संगठनों ने इसे सत्य और धैर्य की जीत बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला न केवल बगीचों को बचाएगा, बल्कि हिमाचल की डगमगाती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती देगा।

अब बागवान बिना किसी कानूनी डर के अपने बगीचों की देखभाल कर सकेंगे और आने वाली फसल की तैयारी में जुट सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश भविष्य में भी बागवानी और वन संरक्षण से जुड़े मामलों के लिए एक नजीर साबित होगा।

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