ऊना / राजन शर्मा
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में, ऊना नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित मैड़ी गांव की देवदारों से घिरी पहाड़ियों के बीच डेरा बाबा बडभाग सिंह जी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोक-आस्था केंद्र है।
यह स्थल केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं, बल्कि सदियों से सामाजिक संतुलन, मानसिक शांति और सामूहिक चेतना का प्रतीक रहा है।हर वर्ष पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
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मैड़ी का डेरा आस्था, साधना और आध्यात्मिक उपचार की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो लोकजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।इतिहास के अनुसार बाबा बडभाग सिंह जी का जन्म वर्ष 1715 में पंजाब के करतारपुर में सोढ़ी वंश में हुआ माना जाता है।
वे धीर मल के वंशज तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार से संबंधित बताए जाते हैं। यह वह दौर था जब अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों से उत्तर भारत राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता से गुजर रहा था।
इन परिस्थितियों में बाबा बडभाग सिंह जी हिमाचल की ओर आए और धारशणी खड्ड के समीप वनों में साधना करते हुए मैड़ी को अपनी तपोभूमि बनाया। उनका यहां स्थायी निवास सीमांत क्षेत्रों में संत परंपरा की उस भूमिका को दर्शाता है, जिसने अशांत समय में समाज को मानसिक और नैतिक संबल दिया।
लोकमान्यताओं के अनुसार बाबा बडभाग सिंह जी ने एक बेर के वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या कर सिद्धियां प्राप्त कीं। कहा जाता है कि उन्होंने नरसिंह नामक उग्र आत्मा को वश में कर मानव सेवा के लिए बाध्य किया। इस लोककथा को अंधविश्वास के बजाय सामाजिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि ऐसे लोक-तीर्थ पारंपरिक समाजों में भय, तनाव और मानसिक असुरक्षा से निपटने के सांस्कृतिक माध्यम रहे हैं।
डेरा परिसर में स्थित गुरुद्वारा और बाबा जी की समाधि श्रद्धा का मुख्य केंद्र हैं। तपस्थली का वही बेर वृक्ष और चरण गंगा जलप्रपात श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं। चरण गंगा के जल को पवित्र और रोगनाशक माना जाता है, जहां श्रद्धालु स्नान कर शारीरिक और आत्मिक शांति की कामना करते हैं।
हर वर्ष फरवरी–मार्च माह में आयोजित होने वाला दस दिवसीय होली अथवा होला मोहल्ला मेला मैड़ी को भक्ति और उत्सव का विराट केंद्र बना देता है। इस दौरान अरदास, पवित्र स्नान और निशान साहिब का आरोहण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
भारत की धार्मिक परंपरा केवल ग्रंथों और संस्थानों तक सीमित नहीं रही है। देश की जीवंत संस्कृति ऐसे लोक-आधारित तीर्थों से भी निर्मित हुई है, जिन्होंने पीढ़ियों तक समाज को नैतिक दिशा और सामूहिक पहचान प्रदान की। मैड़ी का डेरा बाबा बडभाग सिंह जी इसी परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
आज यह स्थल केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक समरसता का मंच बन चुका है। विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालु इस बात का प्रमाण हैं कि आस्था किस प्रकार क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चेतना से जुड़ती है।
मैड़ी का डेरा बाबा बडभाग सिंह जी हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारत की जीवंत संस्कृति किस प्रकार स्थानीय आस्थाओं के माध्यम से आकार लेती है। यह परंपरा आज भी विश्वास, आशा और उपचार के रूप में हिमालय की गोद में निरंतर प्रवाहित हो रही है।
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