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बाबा इकबाल सिंह पांचवी कक्षा के बाद बन गए थे साधु, पढ़े उनसे जुड़े कुछ….

SAPNA THAKUR | 30 जनवरी 2022 at 3:23 pm

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HNN/ नाहन

पदम श्री बाबा इकबाल सिंह का शनिवार को निधन हो गया। उनके निधन से जिला सिरमौर ही नहीं बल्कि देश में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित राष्ट्रपति ने भी उनके निधन पर शोक संवेदना व्यक्त की। बता दें कि संत इकबाल सिंह ने 5वीं कक्षा गांव के स्कूल से की। संत इकबाल सिंह के मुताबिक वह अपना जन्म परमात्मा के नाम पर लगाना चाहते थे। उनकी मां उनको भक्त ध्रुव, प्रह्लाद व साहिबजादों की जीवनी बारे सुनाती थी, जिसके कारण उनकी सोच धर्म अनुरूप बन गयी।

उनके लिए शिक्षा दूसरे नंबर पर थी, पहले नंबर पर परमात्मा का प्रेम था। इसलिए वह 5वीं कक्षा में ही साधु बन गए। हालांकि बाद में परिजन उन्हें वापस ले आए जिसके बाद उन्होंने दीनानगर से 8वीं कक्षा तथा गुरदासपुर से 10वीं कक्षा पास की। उसके बाद इंजीनियर बनने का सोचा, फिर मेडिकल में दाखिला लेकर डाक्टर बनने के बारे में सोचा। आखिरकार एग्रीकल्चर की लाइन को चुना क्योंकि इससे किसानों का भी फायदा किया जा सकता था।

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उस समय एकमात्र कॉलेज लायलपुर एग्रीकल्चर कॉलेज था, जिसमें कठिन मुकाबले के बावजूद उन्हें दाखिला मिल गया। एम.एस.सी. वहीं से की। फिर देश का बंटवारा हो गया एवं पाकिस्तान बन गया, जिस कारण वह लुधियाना कॉलेज में आ गए। वहीं से एम.एससी. की। उनके पिता उन्हें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में दाखिल करवाना चाहते थे एवं उनका दाखिल हो गया पर विदेश नहीं गए, क्योंकि उन्हें संत तेजा सिंह जी की संगत मिल गई थी। संत तेजा सिंह के जीवन से वह बहुत प्रभावित हुए।

उनकी संत तेजा सिंह से मुलाकात देश बंटवारे के बाद खालसा कॉलेज अमृतसर में हुई। तेजा सिंह खालसा कॉलेज के प्रिंसिपल तो थे ही बल्कि अति धार्मिक विचारों वाले भी थे। संत तेजा सिंह चाहते थे कि हिमाचल प्रदेश में एक ऐसा केंद्र बनाएं जहां बच्चों को शिक्षा दी जा सके। संत जी के आदेशानुसार वह बड़ू साहिब स्थान पर आये। इस धरती का मालिक जोगिन्द्र सिंह था, जिससे जमीन खरीद कर बड़े कॉलेजों को आरंभ किया गया।

5 बच्चों से की थी शुरुआत और आज 70 हजार से अधिक बच्चों को दी जाती है शिक्षा

बडू साहिब में 1975 में मिट्टी के गारे से गुरुद्वारा बनाया व गुरु के लंगर की भी शुरुआत की। 5 बच्चों से स्कूल प्रारंभ किया गया। उस समय 30 हजार खर्च हुए थे। बाबा इकबाल सिंह बताते हैं कि उस वक्त मेरी मांगने की आदत नहीं थी क्योंकि कार्यालय में उच्च पदवी ( निदेशक कृषि विभाग हिमाचल प्रदेश ) पर काम किया था एवं बड़े-बड़े लोग मुझसे काम करवाने आते थे पर जब स्कूल में बच्चे बढऩे लगे तो खर्च भी बढ़ गया। संत तेजा सिंह के दिल्ली एवं मुंबई के पुराने सेवादारों ने उन्हें उगाही करने की सलाह दी।

वे स्वयं उगाही करने साथ गए। बच्चों के भविष्य ने उन्हें मांगने वाला बना दिया। जैसे-जैसे स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ी, वह बड़ा मांगने वाले बन गए, फिर उन्होंने कोई शहर एवं कोई देश नहीं छोड़ा जहां वह मांगने नहीं गए। 5 बच्चों से कार्य प्रारंभ हुआ था एवं आज 2 यूनिवर्सिटियां एक बड़ू साहिब एवं एक साबो की तलवंडी दमदमा साहिब बन गई हैं एवं 129 विभिन्न गांवों एवं शहरों में अकाल एकेडमियों एवं अन्य अदारे खोले गए हैं जिसमें लगभग 70 हजार छात्र-छात्राएं आज भी संस्कार मिश्रीत शिक्षा ले रहे है। बडू साहिब में एक 250 बेड का हॉस्पिटल एवं नशा मुक्ति केंद्र भी जनसेवा में चल रहा है।

अपना वेतन कर देते थे जन सेवा में खर्च।

बाबा इकबाल सिंह के मुताबिक उन्होंने इतनी मेहनत से काम किया कि उन्नति करके हिमाचल में डायरेक्टर ऑफ एग्रीकल्चर बन गए, उस वक्त डॉक्टर परमार की सरकार हुआ करती थी। सभी उन्हें बाबा जी कहते थे क्योंकि वह कार्यालय में बिल्कुल सादे कपड़े पहनते थे। बाहर विदेशों में कार्य के लिए जाते समय भी वह सादे पहरावे में ही रहते थे।

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