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भारत में ‘मिसिंग गर्ल्स’ की चिंता: सुधार के दावे, लेकिन चुनौती अब भी गंभीर

Shailesh Saini | 24 जनवरी 2026 at 9:00 am

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मिसिंग गर्ल्स’ भारत के लिए चेतावनी: आंकड़े सुधरे, सोच अब भी सवालों के घेरे में जन्म अनुपात बढ़ने का सरकारी दावा, UN और रिसर्च रिपोर्टों ने उजागर की सच्चाई

नई दिल्ली | हिमाचल नाऊ न्यूज़

भारत में लिंग-भेद के कारण पैदा हुई ‘मिसिंग गर्ल्स’ की समस्या को लेकर नई चिंता सामने आई है।

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एक ओर केंद्र सरकार जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों की रिपोर्टें बताती हैं कि लाखों लड़कियां अब भी जन्म से पहले ही आंकड़ों से बाहर हो रही हैं।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने संसद में दिए गए लिखित जवाब में बताया है कि देश में जन्म के समय लिंग अनुपात 2014-15 में 918 से बढ़कर 2023-24 में 930 लड़कियां प्रति 1000 लड़के तक पहुंच गया है।

सरकार का कहना है कि यह बदलाव बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों और निगरानी तंत्र का नतीजा है।हालांकि, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के आकलन के मुताबिक भारत में हर साल करीब 4.6 लाख लड़कियां ऐसी हैं, जो स्वाभाविक रूप से जन्म ले सकती थीं, लेकिन लिंग-चयन की वजह से ऐसा नहीं हो पाया।

इसी तरह Pew Research Center के अध्ययन में सामने आया है कि वर्ष 2000 से 2019 के बीच लगभग 90 लाख लड़कियां जनसंख्या में “गायब” हो गईं। रिपोर्ट में इसे केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक असंतुलन का संकेत बताया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय औसत में सुधार के बावजूद कई राज्यों और क्षेत्रों में हालात अब भी चिंताजनक बने हुए हैं, जहां पुत्र-प्राथमिकता की सोच आज भी हावी है।

क्यों गंभीर है ‘मिसिंग गर्ल्स’ का मुद्दा

• संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत उन देशों में शामिल है, जहां सबसे अधिक लड़कियां जन्म से पहले ही आंकड़ों से बाहर हो जाती हैं।

• लंबे समय तक लिंग अनुपात असंतुलित रहने से सामाजिक ढांचे पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।

• विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ राज्यों में सुधार के बावजूद कई क्षेत्रों में स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है।

• आने वाले वर्षों में इस असंतुलन का असर विवाह व्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

• रिपोर्टों में इसे केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि समाज की सोच से जुड़ी गंभीर चुनौती बताया गया है।

सुधार का रास्ता

आंकड़ों से आगे सोच बदलने की जरूरत• सरकार का मानना है कि कानून और योजनाएं तभी सफल होंगी, जब समाज उनका साथ देगा

।• विशेषज्ञों के अनुसार बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देना सबसे बड़ा सुधार है।

• शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता से ही लिंग-भेद की जड़ें कमजोर होंगी।

• स्कूलों, पंचायतों और सामाजिक मंचों की भूमिका को बदलाव की कुंजी माना जा रहा है।

• रिपोर्टों में साफ कहा गया है कि सोच बदले बिना सुधार स्थायी नहीं होगा।

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