समीक्षा बैठक से पहले हो सकता है बदलाव, अटकलों का बाजार अब सही मायने में गर्म

HNN/ नाहन

मौजूदा सेमी फाइनल में हार का ठीकरा दो व्यक्तियों के सर फोड़ने की पूरी तैयारी हो चुकी है और अब प्रदेश के चुनावी वर्ष में भाजपा की ओर से अटकलों का बाजार गर्म हो चुका है। हालांकि, मौजूदा मुख्यमंत्री की पब्लिक इमेज अभी भी बरकरार है। बावजूद इसके पप्पू साबित करने में माहिर भाजपा एक और बड़ा चुनावी प्रयोग कर सकती है। मजे की बात तो यह है कि जयराम ठाकुर को कांग्रेस ने नहीं बल्कि अपनों ने ही शुरू से कमजोर साबित करने की कोशिश बरकरार रखी।

बेदाग छवि, साधारण व्यक्तित्व, काबिलियत मे भी कमी नहीं बावजूद इसके सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री फ्री हैंड होकर काम क्यों नहीं कर पाए। यहां लोगों का यह भी मानना है कि केंद्र की दखलअंदाजी कहीं ना कहीं मुख्यमंत्री द्वारा खुद लिए जाने वाले निर्णयों पर भारी रहे हैं। अब जो अटकलें चल रही हैं उसमें बदलाव के पूरे-पूरे संकेत सामने आ गए हैं। जिसमें राजनीतिक समीकरण की बात की जाए तो पूर्व मुख्यमंत्री के सबसे नजदीकी वीरेंद्र कंवर है। इसके साथ सुखराम चौधरी भी धूमल भगत रहे हैं।

दोनों ने बड़े ठाकुर की हार पर अपने-अपने जीते हुए विधानसभा क्षेत्र से त्यागपत्र देकर बड़े ठाकुर को सम्मान देने की बात कही थी। अब एक्टिव रूप से और निचले हिमाचल की बात की जाए तो कहीं ना कहीं वीरेंद्र कवर के ऊपर हाइ कमान दाव खेल सकता है। हालांकि, चुनाव से पहले सुरेश भारद्वाज के नाम पर अटकलें तेज थी मगर उन्होंने जुब्बल-कोटखाई सीट को लेकर बड़ी किरकिरी करवाई है। अब सवाल यह उठता है कि संगठन का जिम्मा किसको दिया जा सकता है। इस पर सबसे ज्यादा अटकलें पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर यानी बड़े ठाकुर के नाम पर चल रही है।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की वर्चुअल बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भी नजर आए और बयान भी दिए। अब यदि हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री बनाने पर विचार करता है तो परिवारवाद वाला मामला उल्टा पड़ सकता है। ऐसे में संगठन चलाने का जिम्मा पूर्व मुख्यमंत्री को दिया जा सकता है। जिसमें सबसे ज्यादा सहायक राजनीति के चाणक्य डॉ. बिंदल, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे सतपाल सिंह सत्ती कुछ बड़े निर्णय और नीतियों के साथ मिशन रिपीट पर एकजुट हो सकते हैं। मगर यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि मौजूदा मंत्रिमंडल सहित संगठन में छोटे ठाकुर यानी जयराम ठाकुर के भगत भी काफी हैं।

सुरेश कश्यप पहले ही अध्यक्ष पद के लिए तैयार नहीं थे मगर उन्होंने हाईकमान से मिली जिम्मेवारी को बखूबी निभाया। मगर यहां एक बड़ी चूक यह भी हुई की प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने पुरानी कार्यकारिणी को ही यथावत रखा। ध्यान रखने योग्य यह भी बात है कि यह कार्यकारिणी पूर्व अध्यक्ष रहे डॉ. राजीव बिंदल के द्वारा 2022 को ध्यान में रखकर ही बनाई गई थी। बिंदल को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिलवाने के बाद बहुत सारे कार्यकर्ताओं में और पदाधिकारियों में निराशा थी। जो फूट या गुटबाजी धरातल पर नहीं थी बिंदल के हटते ही उनके हौसले बुलंद हो गए। परिणाम सोलन नगर निगम और अर्की में सामने दिख गया है।

हालांकि यह भी मानना पड़ेगा कि अर्की को छोड़कर बाकी सब का हार परसेंटेज पहले से बढ़कर गया है जबकि अर्की में हार परसेंटेज कम गया है। यानी कहा जा सकता है कि एंटी बिंदल गैंग के सक्रिय होने के बावजूद बिंदल की मेहनत नजर आई। एक बेहतर मैनेजर और मैनेजमेंट के रूप में बिंदल का अनुभव ना केवल प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी साबित हुआ है। ऐसे में फिर से अध्यक्ष पद देना हाईकमान की खुद की किरकिरी हो सकती है ऐसे में संभवत यह पहला अवसर होगा के डिप्टी सीएम पद डॉ. बिंदल को सौंपा जा सकता है। क्योंकि चुनावी वर्ष है बिंदल पिछले लंबे अरसे से संगठन के तौर पर भी और सरकार के तौर पर भी हाशिए पर चले हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद फिर से लेना कूटनीतिक स्तर पर संभवत वह स्वीकार भी ना करें।

बरहाल, भाजपा अब चाहे कुछ भी दांव खेल ले प्रदेश की जनता महंगाई से त्रस्त है। यहां तक कि प्रदेश के लगभग सभी भाजपा मंडल और पुराना भाजपा कार्यकर्ता ओवर वर्क ओवर मीटिंग और फायदा कुछ नहीं इस विचार के साथ काफी हताश है। भाजपा के कई दिग्गज कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है किस प्रदेश की राजनीति में केंद्र की दखलअंदाजी कम से कम होनी चाहिए। बरहाल यह तो अटकलें हैं कुछ नहीं कहा जा सकता। मगर इतना तो माना जा सकता है कि मुख्यमंत्री को हटाया जाना कहीं ना कहीं प्रदेश में भाजपा को 2022 में नुकसान पहुंचाएगा तो कांग्रेस को भी बड़ा मुद्दा मिल जाएगा।